प्यार की जंग मुसलमान मर्द और हिंदू औरत लड़े या हिंदू मर्द और मुसलमान औरत, ‘लव जिहाद’ के साए में सभी का जीना मुहाल है.
शादी के सात साल बाद भी अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहते-
शादी के सात साल बाद भी अपनी पहचान ज़ाहिर नहीं करना चाहते-
जब मोहब्बत हो गई, तो पूरा अहसास था कि क्या करने जा रहे हैं. मन में बहुत डर था, हम जानते थे कि हमारे जैसे छोटे शहर में ऐसे रिश्ते आम नहीं होते.
मैं हिंदू ब्राह्मण और मेरी होने वाली पत्नी मुसलमान. रिश्ता तो दोनों परिवारों को पसंद नहीं था, पर उनके परिवार की नाराज़गी अलग दर्जे की थी.
दोनों लोगों को जान का ख़तरा था. भविष्य एकदम अनिश्चितित था. आगे क्या होगा, कुछ पता नहीं था.
हमने चुपके से स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत कोर्ट मैरिज की और फिर अपने परिवार को बताया. मजबूरी में उन्होंने हमें क़बूल लिया पर हिंदू रीति-रिवाज़ से हुई शादी के बग़ैर साथ रहने की इजाज़त नहीं दी.
हमारे शहर से बाहर एक जगह मंदिर में घर के कुछ लोगों के सामने शादी करवाई गई. मेरी पत्नी के घर वालों को इसकी ख़बर तक नहीं थी.
बस उसके बाद हमने अपना शहर छोड़ दिया. वहां ख़तरा ही इतना था और दिल्ली के लिए निकल पड़े.
दिल्ली में सिविल सेवा की तैयारी करते समय मेरी पत्नी अक़्सर कहती थीं कि अगर परीक्षा नहीं पास कर पाईं तो क्या होगा जीवन में
जब परीक्षा पास की, तब चीज़ें कुछ हद तक बदलीं. हमें ज़्यादा सम्मान दिया जाने लगा और समाज में हमारे फ़ैसले को भी कुछ हद तक ठीक माना जाने लगा.इतने उतार-चढ़ाव झेलने के बाद हम और मज़बूत हुए हैं. कभी-कभी लगता है कि शायद हम एक दूसरे के लिए ही बने हैं.और यह विश्वास भी पुख़्ता होता है कि समाज को अंदर से झकझोरने और कुछ मूल बदलाव लाने की क्षमता अंतर-धर्म और अंतर्जातीय शादियों में ही है.

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