By:मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
भारत में ये आम धारणा है कि हमारे नेतागण तकनीकी और वैज्ञानिक विषयों की कम समझ रखते हैं. काफ़ी हद्द तक ये बात सही भी हो सकती है. लेकिन ताज़्ज़ुब तो तब होता है जब टेक्नोक्रेट से नेता बने अरविन्द केजरीवाल जैसे लोग भी प्रदूषण से जुड़ी तकनीकी बातों की अनदेखी करके ऑड-ईवेन कार योजना जैसे तुग़लक़ी फ़रमान जारी कर देते हैं. इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या अपने टेक्नोक्रेट मुख्यमंत्री से दिल्लीवासियों को पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियों के बारे में उम्दा सूझ-बूझ दिखाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए! यदि हाँ, केजरीवाल को ‘प्लान से पहले ऐलान’ का रास्ता थामने से पहले कम से कम चुनिन्दा रिपोर्ट्स को तो ज़रूर ख़ुद पढ़ना चाहिए था. यदि उन्होंने सिर्फ़ अख़बारों में छपी रिपोर्ट्स पर ग़ौर किया होता तो भी वो कतई ऐसा हवन नहीं करते जिसमें हाथ जलना तय हो! महात्मा गाँधी ने कहा था, ‘कोई निर्णय नहीं करने से ज़्यादा ख़तरनाक होता है अज्ञानता में लिया गया निर्णय!’
दिल्ली के वायु प्रदूषण पर आईआईटी, कानपुर ने एक व्यापक तकनीकी रिपोर्ट तैयार की है. ये दिल्ली सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों के पास है. लेकिन शायद, दोनों ने ही उस पर ग़ौर नहीं किया. वायु प्रदूषण के सूक्ष्म कणों को Particulate Matter (PM) कहते हैं. ये अलग-अलग श्रेणियों के होते हैं. PM10 श्रेणी के मुताबिक़, राजधानी दिल्ली के वायु प्रदूषण में 56 फ़ीसदी योगदान सड़कों पर उड़ने वाले धूल के कणों (Road Dust) का है. 14 फ़ीसदी प्रदूषण निर्माण-गतिविधियों की वजह से है और 10 फ़ीसदी औद्योगिक प्रदूषण है. नौ फ़ीसदी प्रदूषण वाहनों की वजह से है. बाक़ी 11 फ़ीसदी के लिए अन्य वजहें ज़िम्मेदार हैं. अब यदि ये मान भी लें कि केजरीवाल के लिए Road Dust के मुक़ाबले वाहन प्रदूषण में हाथ डालना अपेक्षाकृत आसान था, तो भी तकनीकी रिपोर्ट ये बताती है कि इससे कुछ ख़ास हासिल नहीं होगा.
PM2.5 श्रेणी के सूक्ष्म कण ज़्यादातर ख़तरनाक और ज़हरीले माने जाते हैं. आईआईटी, दिल्ली के एसके गुट्टीकुंडा के शोध के मुताबिक़, दिल्ली की हवा में मिलने वाले प्रदूषण में जहाँ 38 फ़ीसदी हिस्सेदारी Road Dust की है. वहीं वाहन प्रदूषण का अंशदान 20 फ़ीसदी का है. पल्लवी पन्त और साथियों की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के व्यस्त मथुरा रोड पर गर्मियों में वाहन प्रदूषण की हिस्सेदारी 18.7% और जाड़े में 16.2% पायी गयी. साफ़ है कि अभी केजरीवाल सरकार मुख्य रूप से पूरे वायु प्रदूषण के उस पाँचवें हिस्से को लेकर ही बेचैन है, जो वाहनों से निकलता है. बाक़ी 80 प्रतिशत प्रदूषण तो अछूता है.
20 फ़ीसदी वाले वाहन प्रदूषण के भी कई शेयर होल्डर्स हैं. इसमें 46 फ़ीसदी हिस्सेदारी ट्रक जैसे भारी वाहनों की है तो 33 फ़ीसदी का योगदान दो-पहिया वाहनों का है. 11 फ़ीसदी प्रदूषण तिपहिया और जेनेरेटर जैसे अन्य क़िस्म के इंजनों का है. 10 फ़ीसदी के साथ कारें सबसे पीछे हैं. साफ़ है कि ‘ऑड-ईवेन’ से सिर्फ़ 10 फ़ीसदी योगदान देने वालों पर निशाना साधा जा रहा है. इस तरह, केजरीवाल सरकार ने कुल प्रदूषण के 20 फ़ीसदी (वाहन प्रदूषण) और फिर इस 20 फ़ीसदी के भी 10 फ़ीसदी (कारों का हिस्सा) हिस्से पर ही निशाना साधा है. ये कुल वाहन प्रदूषण का 2 फ़ीसदी हुआ. इसमें से ‘ऑड-ईवेन’ के तहत आधी से ज़्यादा कारें तो चलती ही रहेंगी, क्योंकि सीएनजी और महिला ड्राइवर वाली कारों को छूट हासिल है. अब यदि इस श्रेणी में आधा फ़ीसदी कारें भी आयीं तो सारी क़वायद राजधानी दिल्ली की हवा के सिर्फ़ आधा फ़ीसदी (0.5%) प्रदूषण रोकने के लिए हो रही है.
व्यवहार में तो ये उससे भी कम बैठेगी. ज़रा इसे भी समझते चलिए. रात 8 से लेकर सुबह 8 बजे तक तो ‘ऑड-ईवेन’ लागू होगा नहीं. रविवार भी इसमें शामिल नहीं है. यानी 15 दिनों की इस पूरा हॉय-तौबा में 12-12 घंटे के जो 30 हिस्से होंगे, उनमें से सिर्फ़ 12 हिस्से ही इससे प्रभावित होंगे. यानी 15 दिन के कुल 360 घंटों में से 144 घंटे के लिए ‘ऑड-ईवेन’ योजना लागू होगी. ये पूरे वक़्त का सिर्फ़ 40 फ़ीसदी है. इसका मतलब ये हुआ कि यदि ‘ऑड-ईवेन’ योजना शत-प्रतिशत सफ़ल भी हो जाएगी. तो भी 0.8% (2% का 40%) से ज़्यादा का फ़ायदा नहीं होगा. साफ़ है कि यदि केजरीवाल ने इस Cost-Benefit Analysis का हिसाब लगाया होता तो वो अपना तुग़लक़ी फ़रमान जारी करने से पूरा परहेज़ करते और प्रदूषण पर नकेल कसने के लिए ऐसे तरीक़े अपनाते जो वाकई में हालत को बदलने में मददगार साबित होते.

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