Tuesday, 29 December 2015

उत्तर प्रदेश में भुखमरी का जिम्मेदार कौन?


उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम को क्रियान्वित करने में असफल रहने से सूखाग्रस्त क्षेत्रों में जीवन का संकट गहरा हुआ है.
बुंदेलखंड, या कहें कि यूपी वाले बुंदेलखंड से आ रही खबरें बहुत डरावनी हैं. योगेंद्र यादव के नेतृत्व में स्वराज अभियान के तहत कराए गए एक रैपिड सर्वे के साक्ष्य कहते हैं कि इलाका अकाल की दशा की तरफ बढ़ रहा है.
मसलन, सर्वेक्षण में नमूने के तौर पर चुने गए 38 प्रतिशत गांवों में बीते आठ महीने में भुखमरी या कुपोषण से एक ना एक व्यक्ति की मौत हुई है.
ग़रीब परिवारों में महज पचास प्रतिशत परिवारों को बीते 30 दिनों में खाने के लिए दाल नसीब हुई और पचास प्रतिशत से थोड़े ही कम परिवार ऐसे हैं जो इस अवधि में अपने बच्चों को पीने के लिए दूध जुटा सके हैं.
बड़ी संख्या में लोग जंगली कंद-मूल बीनते या खाकर जीवन चलाते दिखे. सर्वे के बाद स्वतंत्र पत्रकारों की जांच-परख से भी इस दुर्दशा की पुष्टि हुई.
जीवन को घेरने वाले इस संकट का बड़ा रिश्ता समय रहते खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफ़एसए) को क्रियान्वित करने में यूपी सरकार के असफल रहने से हैं.

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